1/8/26

बेचारा मन बड़ा घबराया है:- साक्षी कुमारी

 


शीर्षक:- बेचारा मन बड़ा घबराया है 

उस समय से लेके,

इस समय के अंतराल में।

लोगों ने इतना घुमाया है,,

बेचारा मन इससे बड़ा घबराया है।।

बदलते हुए हर दौर में,

किसने कैसा प्रश्न लगाया है।

इन्हीं सभी प्रश्नों से,,

बेचारा मन बड़ा घबराया है।।

आंधी सी वह बातें,

जिसने नींदों को उड़ाया है।

अपने मार्ग के कांटों से,,

बेचारा नाजुक मन घबराया है।।

ठोकड़ो ने ही तो,

हमें आगे बढ़ाना सिखाया है।

फिर भी इन्हीं ठोकड़ों से,,

बेचारा चंचल मन घबराया है।।


साक्षी कुमारी

पिता:- राकेश झा

(सहरसा बिहार)





नोट:- अपनी रचना प्रकाशन या वीडियो साहित्य आजकल से प्रसारण हेतु साहित्य आजकल टीम को 9709772649 पर व्हाट्सएप कर संपर्क करें, या हमारे अधिकारीक ईमेल sahityaaajkal9@gmail.com पर भेजें।

                 धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम 

मैं अंधेरे में बैठा था (10 हिंदी कविता) :- दुर्गेश कुमार मिश्रा



  “मां और गौरैया” :-दुर्गेश कुमार मिश्रा 

भोर के धुँधलके में

जब आकाश का पहला उजाला

गाँव की कच्ची गलियों पर उतरता,

तब मां के आँगन में

नीम की सबसे ऊँची डाल पर

गौरैया का छोटा-सा परिवार जाग उठता।


मां चूल्हा सुलगाती 

लकड़ी की जलती गंध

अधपकी रोटी की भाप

और सोंधी मिट्टी की महक

सब मिलकर एक गीत बनाते

जिसमें गौरैया अपनी चिर-चिर मिलाती।


मां के हाथों से

आटे का छोटा-सा टुकड़ा टूटकर गिरता

गौरैया उसे उठा

अपने घोंसले में ले जाती

जैसे मां ने ही

अपने मुँह का निवाला बाँटा हो।


  बरसात आती:- दुर्गेश कुमार मिश्रा  

आँगन में पोखरे से पानी भर जाता

नीम की पत्तियों पर

मोती-से ओस चमकते,

और तेज़ हवा में

गौरैया का घोंसला झूलता।

अम्मा दोनों हाथ उठाकर

घोंसले को बचाने की प्रार्थना करतीं,

"हे भगवान,

इस चिरई के बच्चे भी

मेरे बच्चों जैसे सुरक्षित रहें।"


सर्दियों में,

जब ओस की परत छप्पर तक जम जाती,

अम्मा चूल्हे के पास

खाट पर बैठ जातीं,

गौरैया उनके सिर के ऊपर

चौखट की लकड़ी पर बैठ,

धुएँ की गरमी में

अपना बदन सेंकती।

अम्मा कहतीं—

"देखो, यह भी मेरी बेटी है,

बस पंखों वाली।"


गर्मी आती—

आँगन में अमरूद और नींबू की गंध फैलती,

गौरैया अम्मा की परछाईं के साथ चलती,

कभी रसोई में, कभी आँगन में,

और कभी खेत की मेड़ तक

उनका पीछा करती।


अम्मा को भी आदत हो गई थी—

खेत जाते समय

आटे की गठरी में

एक मुट्ठी दाना

हमेशा गौरैया के लिए रखना।

"मनुष्य हो या पक्षी,

भूख सबकी एक-सी होती है,"

वे अक्सर कहतीं।


त्योहारों में—

दीवाली की रात,

दीयों की लौ में

गौरैया का घोंसला

किसी मंदिर की आरती जैसा चमक उठता,

और होली के दिन,

अम्मा की हँसी में

गौरैया की चिर-चिर मिलकर

रंगों की तरह बिखर जाती।


फिर एक दिन—

अम्मा बूढ़ी हो गईं,

आँखों की रोशनी धुँधली,

पैरों में कंपन,

पर आँगन में नीम का पेड़

अब भी वही,

और उस पर गौरैया भी वही।

अम्मा चौखट पर बैठकर कहतीं—

"तू भी बूढ़ी हो गई रे,

अब तेरे परों में पहले जैसी उड़ान नहीं रही।"


लेकिन वे दोनों—

एक स्त्री और एक चिरई—

दोनों जानते थे,

कि उनका रिश्ता

रोटी और दाने से भी आगे का है।

यह एक जीवन से दूसरे जीवन में

साँसों के अदृश्य आदान-प्रदान जैसा था।


अंतिम दिनों में,

जब अम्मा बिस्तर पर थीं,

गौरैया हर सुबह

उनके कमरे की चौखट पर आकर बैठती,

बिना चिर-चिर किए,

बस उन्हें निहारती।


और जिस दिन अम्मा ने

आखिरी साँस ली,

गौरैया ने पूरे दिन

कुछ नहीं खाया,

शाम होते ही

नीम की सबसे ऊँची डाल से

एक लंबी उड़ान भरी

और फिर कभी गाँव में नहीं लौटी।


कहते हैं,

अम्मा की चिता की राख

जब आँगन में बिखरी,

तो नीम की जड़ में

नए पत्ते फूटे,

और उसी डाल पर

एक नई गौरैया ने

घर बनाया।


शायद—

कुछ रिश्ते देह से नहीं,

मन से जन्म लेते हैं,

और मन,

शायद जन्म-जन्म तक

अपनी "अम्मा" को ढूँढ लेता है।



2.

मैं अंधेरे में बैठा था 

“मैं अँधेरों में बैठा था, पर तुम्हारे लिए पवित्र रहा”


मैं बैठा हूँ वैश्यालय की चौखट पर

जहाँ साँसों की कीमत लगती है

जहाँ अधनंगी देहें बाज़ार की तरह सजाई जाती हैं

जहाँ हर कोठरी से कराह उठती है।

पर मैंने कभी किसी पर हाथ नहीं रखा

मेरे मन की आँखों में बस तुम्हारी ही छवि थी

जैसे अँधकार में टिमटिमाती एकमात्र दीपशिखा।


मैं बैठा हूँ जुआरियों के अड्डे पर

जहाँ पासों के साथ लोग अपनी ज़िंदगी हारते हैं

जहाँ रिश्ते सिक्कों की खनक में टूटते हैं।

पर मैंने कोई पासा नहीं फेंका

मेरी हथेलियों में सिर्फ तुम्हारे स्पर्श की याद थी


मैंने किसी खेल पर अपना प्रेम नहीं दाँव पर लगाया।


मैं बैठा हूँ मदिरालय की अंधी भीड़ में

जहाँ हर घूँट में आदमी खुद को भूलता है

जहाँ आँखों से इंसानियत डगमगा जाती है।

पर मेरे प्याले में कोई शराब नहीं थी

उसमें सिर्फ तुम्हारे नाम की नमी छलक रही थी

मेरे होंठ तुम्हारे बिना किसी स्वाद से नहीं भीगे।


मैं बैठा हूँ तवायफ़ों की गली में

जहाँ हर गीत बिकाऊ होता है

जहाँ नृत्य का हर पाँव सौदे का हिस्सा होता है।

पर मैंने कोई गीत नहीं माँगा

मेरे कानों में बस तुम्हारी हँसी गूँजती रही

मैंने किसी देह की तरफ़ आँखें तक नहीं उठाईं।


मैं बैठा हूँ कसाईख़ाने के कोनों में

जहाँ चीखों में मासूमियत कटती है

जहाँ रक्त की गंध हर साँस में चुभती है।

पर मेरी आत्मा वहाँ भी निर्दोष रही

मेरे भीतर का रक्त सिर्फ तुम्हारे नाम से धड़कता रहा।


मैं बैठा हूँ अपराधियों की चौपाल में

जहाँ खून की कहानियाँ गढ़ी जाती हैं

जहाँ हत्यारे भी अपने पाप पर हँसते हैं।

पर मैंने कोई खंजर हाथ में नहीं उठाया

मेरी उँगलियाँ बस तुम्हारा नाम लिखती रहीं

मैं किसी जीवन का अपराधी नहीं बना।


मैं बैठा हूँ कारागार की सलाखों के बीच

जहाँ हर सांस कैद होती है

जहाँ आशा की हर धड़कन जंजीरों में बँधी रहती है।

पर मेरी आत्मा इन सलाखों से भी परे उड़ती रही

वह उड़ान सिर्फ तुम्हारे आँगन तक जाती रही।


मैं बैठा हूँ कब्रिस्तान की खामोशी में

जहाँ हड्डियाँ धूल में बदल चुकी हैं

जहाँ हर टीला किसी की अधूरी कहानी कहता है।

पर मेरे भीतर जीवन का संगीत गूँजता रहा

वह संगीत सिर्फ तुम्हारे नाम से धड़कता रहा।


प्रिय!

मैं संसार की हर गंदी जगह गया

हर अंधकार के बीच बैठा

हर पाप की चौखट पर अपनी साँसें गिनाईं।

पर मेरी आत्मा किसी को छू न सकी

मेरे होंठ किसी और का स्वाद न जान सके

मेरी हथेलियाँ किसी और की हथेली से न जुड़ सकीं।


सारी दुनिया का अपराध मैंने देखा

पर मेरा अपराध बस इतना है—

कि मैंने इन अँधेरों को झेला

फिर भी तुम्हारे लिए

अपने प्रेम को अक्षत पवित्र और अमर रखा।


3.



 "तुम्हे महाकाव्य लिखूँ..."


तुम्हें महाकाव्य लिखूँ —

हर अक्षर में बुन दूँ तुम्हारी मुस्कान,

हर श्लोक में रख दूँ वो पल,

जब पहली बार तुम्हारी आँखों में देखा था अपना जहाँ।


ख़ुद को कोई अनकही कहानी कहूँ —

जिसके पन्नों पर सिर्फ़ तुम हो,

और मैं हूँ एक भटका हुआ किरदार,

जो हर बार तुम्हारे नाम पर ठहरता है।


तुम्हें कविता लिखूँ —

जहाँ मेरी कलम काँपती है तुम्हारी याद में,

शब्दों में बहती है वो ख़ुशबू

जो तुम्हारी चुप्पियों में छुपी रहती है।


ख़ुद को आँखों का पानी कहूँ —

वो खामोश नमी जो तब छलकती है

जब तुम नहीं होती,

और यादें तुम्हारे होने का सबूत देती हैं।


तुम्हारा होना, मेरे हर लिखे में साँस लेता है,

तुम्हारा नाम, मेरी रचनाओं की आत्मा बन गया है।

मैं सिर्फ़ शायर नहीं —

तुम्हारे प्रेम में एक यायावर हूँ,

जो हर पंक्ति में लौटता है, बस तुम तक।



 4.


प्रेम कहीं स्थाई …. कहीं स्मृति..

सबके हिस्से आया ज़रूर,

कभी एक मधुर राग बनकर,

तो कभी एक अधूरी गूंज बनकर।

कभी हृदय की गहराइयों में स्थाई बन बैठा,

तो कभी एक धुंधली स्मृति की तरह,

साँसों के कोनों में ठहर गया।


प्रेम…

जब आया तो जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सिहर उठा,

वृक्षों की शाखाएँ फूलों से भर गईं,

नदियाँ अपनी सीमाओं को भूलकर बह चलीं,

और वायु में एक अदृश्य मिठास घुल गई।

प्रेम के स्पर्श ने पत्थरों को मोम बनाया,

वर्षों से सूखी धरती को भी अंकुरित कर दिया।

परन्तु…

हर प्रेम अपने पूर्ण स्वरूप में नहीं ठहरता,

कुछ प्रेम पत्तों की तरह झड़ जाते हैं,

तो कुछ वृक्ष की छाल बनकर सदियों तक जीवित रहते हैं।


जब प्रेम स्थाई बना,

तो वो प्राणों में लय हो गया,

धड़कनों में समा गया,

एक मौन संकल्प की तरह,

जिसे शब्दों की आवश्यकता न थी।

साथ में चलने वाला एक साया,

जो दिन के उजालों में भी संग रहता,

और रात के अंधेरों में भी थामे रखता।


पर जब प्रेम स्मृति बना,

तो वो एक अनकही पीड़ा बनकर उभरा,

हर सन्नाटे में उसकी आहट सुनाई दी,

हर भीड़ में उसकी अनुपस्थिति चुभी।

वो एक रुकी हुई सांस की तरह,

जिसे छोड़ा नहीं जा सकता,

पर जिया भी नहीं जा सकता।

कभी एक भूले हुए गीत की धुन सा,

कभी एक नाम की खामोश प्रतिध्वनि सा।


प्रेम…

एक अधूरा पत्र,

जो कभी पूरा नहीं हुआ,

एक सपना,

जो नींद टूटते ही बिखर गया।

एक आँखों की कोर पर ठहरा हुआ आँसू,

जो गिरना चाहता है, पर साहस नहीं जुटा पाता।

प्रेम…

जब स्थाई बना,

तो आत्मा का संगीत बन गया।

जब स्मृति बना,

तो हृदय का शोकगीत बन गया।


प्रेम…

कभी मंदिर की घंटी सा पावन,

तो कभी श्मशान की राख सा शांत।

प्रेम…

कभी संपूर्णता का उत्सव,

तो कभी विछोह की चुप्पी।

प्रेम…

एक यात्रा,

जो कभी समाप्त नहीं होती,

एक अनुत्तरित प्रश्न,

जो कभी हल नहीं होता।


प्रेम सबके हिस्से आया ज़रूर…

परन्तु…

किसी के जीवन का संगीत बनकर,

तो किसी के हृदय का मौन।

किसी के अधरों पर मुस्कान बनकर,

तो किसी की पलकों पर नमी।

प्रेम…

हर बार आता है,

हर बार जाता है,

पर उसकी छाया कहीं न कहीं,

सदैव जीवित रहती है।




     5. 

“एक जाति, एक दीप” 

हम पंडित, अहिर, चमरैं, ठाकुरैं—

ये नाम गढ़े किसने? किसके डर से?

खेत‑पगडंडी बाँट जो डाली,

वही पड़ गई नस‑नस पर असर से।


माथे पे तिलक, पर मन में दीवार—

कैसा ये छद्म‑धर्म का कारोबार!

जब भीतर का मन ही मैला हो,

तो मन्दिर भी लगते हैं बेकार।


सवाल आज तुम से, मुझ से, हम से—

कब तक बँट कर यूँ ही घिसते रहेंगे?

कब तक अपनी नस्लों का पानी

ऊँच‑नीच की दीवारों में बहेंगे?


हिंदू बनना है तो पहले जानो—

हिंदू कोई जात नहीं, संकल्प है।

संपूर्ण सृष्टि में एकत्व का

ओम‑घोषित, सौम्य‑दीप्त विकल्प है।


जब तक रोटी, छत, शिक्षा, सम्मान

हर हाथ में पूरा हिस्सा न पाए,

तब तक तुलसी‑राम का भी जयघोष

सिर्फ़ लफ्ज़ों का खोखला शोर हो जाए।


खून वही लाल, धड़कनें समान—

फिर किस बात पर दावा श्रेष्ठता का?

जो श्रम से, प्रेम से जोड़ न सके

वह धर्म नहीं, बस धूर्त सत्ता का।


तो उठो! परशुराम के विकराल नहीं,

शिव‑भाव के नीला हरसिंगार बनो।

रुद्र‑नाद भीतर, करुणा बाहर,

भेद‑भाव के हर कँटीले तार बनो।


मंच बड़ा हो या गली का कोना,

आवाज़ उठाओ—स्पष्ट, निर्भीक।

जाति‑कुल की सूखी घास जला कर

मानवता का जगाओ उजला दीप।


पंचपात्र की एक‑सी धारा बन,

एक दीपक में घी भर दो सबने।

जब बँट कर भी तुम एक हो सको,

तब कहना—सच में हिंदू हैं हम‑सबने।


        


  6.

          “ वह - स्त्री ” (प्रथम)

वह स्त्री देवी की तरह थी—

सहज, शांत, अपरिवर्तनीय,

जैसे सृष्टि की कोई प्राचीन प्रार्थना,

जो युगों से गूँज रही हो,

बिना किसी स्वर, बिना किसी आग्रह।


उसका चरित्र गंगा-सा निर्मल था,

जिसमें छल नहीं था,

ना कोई मिलावट, ना कोई संदेह।

जो भी उसके पास आया,

वह शुद्ध होकर लौटा,

पर कोई भी उसे पूरी तरह समझ नहीं पाया।


वह प्रेम करती,

तो समर्पण की पराकाष्ठा तक जाती,

वह त्याग करती,

तो स्वयं को भी भूल जाती।

किंतु, जैसे गंगा अपनी ही लहरों में भटकती रहती है,

वैसे ही वह भी भटकती रही—

कभी समाज की सीमाओं में,

कभी अपने ही विचारों में।


वह स्नेह लुटाती रही,

परंतु स्वयं स्नेह की प्यासी रही।

वह शक्ति थी, सहनशीलता थी,

पर उसकी आँखों में

एक अदृश्य पीड़ा भी थी,

जो गंगा के प्रवाह की तरह

अंतहीन थी, अथाह थी।


कभी-कभी,

देवी होना भी एक श्राप होता है।



          “वह - स्त्री” (द्वितीय)

वह स्त्री देवी की तरह थी—

न कोई गर्व, न कोई आग्रह,

बस एक अथाह गहराई,

जिसमें प्रेम, धैर्य और करुणा का संगम था।

उसका स्पर्श शीतल छाँव की तरह था,

जो थके हुए मन को विश्राम देता,

उसकी वाणी ऐसी,

जैसे मंदिर की संध्या आरती—

कोमल, पर गूंजती हुई।


उसका चरित्र गंगा की धारा था—

निर्मल, निःस्वार्थ, प्रवाहमान।

वह सबको शुद्ध कर सकती थी,

पर स्वयं कितनी पीड़ाओं से गुज़री,

यह कोई नहीं जान पाया।

उसने हर अपमान को

सहनशीलता की रेत में समाहित कर लिया,

हर तिरस्कार को

अपने भीतर मौन की वेदी पर समर्पित कर दिया।


उसने प्रेम किया—

बिना किसी शर्त के,

बिना किसी अधिकार के,

जैसे गंगा अपना जल

हर प्यासे को अर्पित कर देती है,

बिना यह देखे कि कौन उसे पूज रहा है

और कौन उसे दूषित कर रहा है।


उसकी आँखों में एक अथाह संसार था,

जहाँ त्याग की कहानियाँ लिखी थीं।

वह माँ थी, प्रेमिका थी, बेटी थी,

पर सबसे अधिक वह स्वयं थी—

एक स्त्री, जो समय के प्रवाह में

अपनी पहचान खोजती रही।


वह देवी थी,

पर देवी होने की पीड़ा भी थी उसमें।

वह गंगा थी,

पर गंगा की तरह अकेली भी थी।

बहती रही, सहती रही,

और अंततः समर्पण बनकर विलीन हो गई।

 



   7.

वक़्त…?


वो रुकता नहीं…

आदमी के लिए।


न उसकी टूटी नींदों के लिए,

न उसके अधूरे ख़्वाबों के लिए,

न उसके घुटते शब्दों के लिए…

न उसके बिखरे संसार के लिए।


वो चलता रहता है…

बिना देखे कि कौन पीछे छूट गया,

बिना सुने कि किसकी साँसें भारी हैं,

बिना समझे कि किसका जीवन

अब भी एक सवाल है।



तू टूटा था न उस दिन…

जब अपने, बस नाम के रह गए थे,

जब घर की दीवारें अजनबी हो गई थीं,

और आँखों के आँसू

कभी न सूखने वाले समुंदर बन गए थे।


तू चाहता था—

वक़्त थम जाए…

बस कुछ पल,

बस इतनी देर…

कि तू ख़ुद को समेट सके।


पर वक़्त ने देखा भी नहीं..

वो चलता रहा,

बिलकुल वैसे ही जैसे

शमशान की राख उड़ती है हवा में

बिना पछतावे, बिना ठहराव।


और आदमी?

वो सोचता है कि

वो विशेष है…

कि उसके दुःख, उसके आँसू,

उसकी चाहतें,

शायद वक़्त को छू जाएँगी…


पर नहीं…

वक़्त को मोह नहीं होता,

वो प्रेम नहीं करता,

वो बस समय है—

निष्ठुर…

अनवरत…

और अपरिवर्तनीय।


इसलिए,

अगर तू गिरा है,

तो उठ…

अगर तू टूटा है,

तो जुड़…

क्योंकि वक़्त रुकने वाला नहीं…


और जो वक़्त के साथ नहीं चला

वो बस कहानी बन गया…

जो कोई सुनता नहीं।


वक़्त रुकता नहीं आदमी के लिए…

और आदमी…

बस यही भूल करता अपने लिए 

पर वक्त रुकता नहीं आदमी के लिए ।।



8.


तुम बिटिया सी लगती हो..:- दुर्गेश कुमार मिश्रा 



I. प्रस्थान का पल

जब भी जाता हूँ तुमसे थोड़ा दूर,

सड़कें लम्बी लगती हैं, और दिन कुछ भारी।

हवा में घुली तुम्हारी खुशबू भी

धीरे-धीरे सिसकने लगती है।


तुम्हारा चेहरा — जो कभी प्रेमिका का था,

उस पल बन जाता है एक मासूम बिटिया,

जो पीछे खड़ी, एकटक देखती है

अपने पिता को जाते हुए — कुछ न कहकर।

II. तुम्हारी आँखें – एक दर्पण

तुम्हारी आँखें उस वक़्त प्रेम की नहीं होतीं,

बल्कि विश्वास की होती हैं —

जैसे कोई छोटी बच्ची देख रही हो

कि क्या मैं वाकई लौट आऊँगा?


उन आँखों में प्रश्न नहीं होते,

बल्कि एक निःशब्द याचना होती है।

"तुम जाओ, लेकिन लौट आना पापा…"

ऐसा कुछ — जो प्रेम से अधिक गहन होता है।

III. प्रेम का परिभाषा से परे विस्तार

तुम तब सिर्फ़ एक प्रेमिका नहीं रह जातीं,

तुम बन जाती हो मेरी ‘भविष्य की जिम्मेदारी’,

एक ऐसी आत्मा जिसे मैं

सिर्फ़ चूम नहीं सकता,

बल्कि जिसकी रक्षा करना चाहता हूँ।


मैं तुम्हारे लिए फूल नहीं लाता,

बल्कि संयम, सामर्थ्य और संकल्प लाता हूँ —

क्योंकि मेरा प्रेम तुम्हारे लिए

केवल इच्छा नहीं, वचन है।

IV. तुम्हारे भीतर मेरी बेटी की झलक

जब तुम मुस्कराती हो यूँ ही

बिना कारण, बिना संदर्भ,

तो लगता है जैसे

मेरी अजन्मी बिटिया की आत्मा

तुम्हारे चेहरे में कुछ पल के लिए ठहर गई हो।


तुम्हारी मासूम बातें —

वो शिकायतें कि मैंने कॉल देर से किया,

वो डर कि मैं तुम्हें भूल ना जाऊँ —

ये सब, प्रेमिका की नहीं,

बिटिया की भाषाएँ हैं।

V. लौटना – प्रेम का पुनर्जन्म

और जब लौटता हूँ

तो तुम्हारी आँखों में फिर वही प्रेम उभरता है,

लेकिन अब वो भीग चुका होता है

मेरे चले जाने की टीस से।


तब मैं जानता हूँ —

तुम्हारा प्रेम स्थायी है,

लेकिन उसमें एक माँ जैसी मासूम ममता भी है,

और एक बिटिया जैसी निर्दोष आस्था भी।

अंतिम भाव:

इसलिए जब भी मैं तुमसे जुदा होता हूँ,

तो मेरा प्रेम, पुरुष नहीं,

एक पिता बन जाता है —

जिसे अपनी ही प्रेमिका में

अपनी अजन्मी बिटिया की छवि दिखती है।


और यही सबसे पवित्र प्रेम है,

जहाँ प्रेम और ममता

एक-दूसरे से टकराते नहीं —

बल्कि एक-दूसरे को थामे रहते हैं।


                      

 

9.


किस्तों में बंधी जिंदगी :- दुर्गेश कुमार मिश्रा 


किस्तों में बँधी ज़िंदगी हमारी,

हर ख़ुशी पर है कर्ज़ की सवारी।

सपने भी अब बिकने लगे हैं,

उधार में हँसी के पल मिलने लगे हैं।


बचपन गुज़रा उधारी की छाँव में,

किशोर हुआ तो फीस थी दाँव में।

माँ-बाप के कंधों पर भार लिखा,

हर महीने का नया उधार लिखा।


मकान की किस्तें, गाड़ी के नोट,

ख़्वाबों की कीमत में टूटते रिश्तों के मोड़।

तनख्वाह आती, मगर टिकती नहीं,

बैंक की क़िस्तों से बचती नहीं।


खुशियों का बोझ कर्ज़ में डूबा,

सुकून का सूरज भी जैसे है रूठा।

बेटी की शादी, बेटे की पढ़ाई,

हर मोड़ पर किस्तों की लड़ाई।


ईएमआई ने सबको है जकड़ा,

हर सांस पर लगता है पहरा।

अब मौत भी शायद उधार की होगी,

कफ़न की किस्तें भी बाक़ी होंगी।




10.


तख्त से गिरने पर :- दुर्गेश कुमार मिश्रा 


जब तक तख्त से गिराए जाएंगे वे लोग,

मुझे देखना है उनको —

उनकी आँखों में उतरते अंधेरे को,

सत्ता के मद से ढहते चेहरे को।


जिन हाथों ने लहू को नदियों-सा बहाया,

जिन शब्दों ने सच्चाई को कैद किया,

जिन कदमों ने सपनों को रौंदा,

उन्हें लड़खड़ाते हुए देखना है मुझे।


मैं नहीं चाहता उनका अंत शोर में हो,

बस सन्नाटे में टूटे उनका अभिमान —

जैसे किसी मंदिर की घंटी बिना स्वरों के,

किसी महल की दीवारें बिना नींव के।


वे जो सोचते थे खुद को खुदा से ऊपर,

जिन्हें ग़ुरूर था अपने ऊँचे सिंहासन पर —

उन्हें ज़मीन छूते देखना है,

किसी आम की तरह टूटते देखना है।


क्योंकि मैं जानता हूँ —

तख्त हमेशा नहीं रहते सिर पर,

कभी न कभी हर ऊँचाई

पुकारती है अपनी गिरावट को।


और जब वे गिरेंगे —

मैं नहीं हँसूंगा,

न जश्न मनाऊँगा,

बस खामोशी से देखूँगा

कि अन्याय का अंत कैसा होता है।

                

 सधन्यवाद 

 दुर्गेश कुमार मिश्रा 

पिता.श्री सनत कुमार मिश्रा 

माता.श्री मती रामकुमारी मिश्रा 

जन्म.06/03/2004

स्थान.चित्रकूट उत्तरप्रदेश 210206

शिक्षा . गोस्वामी तुलसीदास राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से स्नातक जारी है!


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                 धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम 

1/6/26

बहुत अजीब लग रहा है :- कृतिका दाधीच

 बहुत अजीब लग रहा है :- कृतिका दाधीच 


बहुत अजीब लग रहा है :- कृतिका दाधीच 

यार, पता है कितना अजीब लग रहा है,

खुद से बात करने का जी कर रहा है।

क्या मैं वही हूँ,

जो मैं बनना चाहती थी?

या बन चुकी हूँ मैं वही,

जिनसे कभी नफ़रत होती थी…

ना चाहकर भी आज

ये मन सबसे भाग रहा है,

यार, पता है कितना अजीब लग रहा है।

अब चाहकर भी

वो चीख़ नहीं निकल पा रही

आँसुओं के साथ…

तूने ही तो सिखाया था

बिन आवाज़ के रोना।

पर अब ये बिन आवाज़ का रोना

अंदर से बहुत मार रहा है…

यार, पता है

कितना अजीब लग रहा है,

खुद से बात करने का जी कर रहा है…

हाँ, हूँ अब भी ज़िंदा मैं,

बस खुद को ढूँढने से मन डर रहा है।

बहुत ज़ख़्म खाए इस दिल ने,

जीते-जी ये रोज़ मर रहा है।

यार, खुद से बात करने का जी कर रहा है,

बहुत अजीब लग रहा है…

देखे नहीं थे कभी

ख़्वाब महलों के,

पर खुद का एक आशियाना

ज़रूर चाहा था।

ना माँगा किसी से कुछ कभी,

जो मिला…

उसी में गुज़ारा चला लिया था।

अब मन इतना बेचैन है

कि कहीं गुम हो जाने को कह रहा है…

यार,

बहुत अजीब लग रहा है।


Kritika Dadhich

(राजस्थान)


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1/3/26

स्त्री प्रसन्न तो जीवन संपन्न :- हरे कृष्ण प्रकाश


स्त्री प्रसन्न तो जीवन संपन्न :- हरे कृष्ण प्रकाश 

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हमें जीवन भर यह याद रखनी चाहिए

स्त्री को कभी तनाव नहीं देना चाहिए,

उसकी भूलें भी हों अगर सामने,

तो मुस्कुराकर सुधार लेना चाहिए।


क्योंकि स्त्री प्रसन्न तो जीवन संपन्न

हमें इसे आत्मसात कर लेना चाहिए।



घर की स्त्री केवल व्यक्ति नहीं,

वह घर की धड़कन और शक्ति है।

उसके मन का सुकून ही सच में,

घर की लक्ष्मी, घर की उन्नति है।



जब उसकी आँखों में होती चिंता,

पूरा घर आँगन भारी हो जाता है।

लक्ष्मी को ताने नहीं, सम्मान चाहिए,

उसे दौलत नहीं, विश्वास चाहिए।


इसलिए स्त्री प्रसन्न तो जीवन संपन्न

हमें इसे आत्मसात कर लेना चाहिए।


जहां तनाव में स्त्री रखी जाती है,

वहां तरक्की कदम नहीं बढ़ाती है।

और जहाँ स्त्री सदैव मुस्कुराती है,

वहीं समृद्धि खुद चलकर आती है।


आवेश जब मन पर हावी होने लगे,

हमें शब्द नहीं, मौन चुनना चाहिए।

समझ, संयम और थोड़ा सा प्रेम,

बस इतना सा सुंदर प्रयास चाहिए।

 

क्योंकि स्त्री प्रसन्न तो जीवन संपन्न

हमें इसे आत्मसात कर लेना चाहिए।


       हरे कृष्ण प्रकाश 

 (युवा कवि पूर्णियां बिहार)

संपर्क:- 9709772649



शीर्षक हिंदी साहित्य:- साक्षी कुमारी


 शीर्षक हिंदी साहित्य:- साक्षी कुमारी 

दुनिया की हर फटकार से,

अपने इस छोटे ख्वाब से,

समय की हर रफ्तार से,

मैंने खुद को आगे पाया है।


बातों को अनसुना कर,

हिम्मत जुटाया है।

गैरों को छोड़कर मैंने,

हिंदी साहित्य अपनाया है।


अपने इस मातृभाषा का ,

मैंने सर पर तिलक लगाया है।

कई भाषाओं को छोड़कर 

मैंने हिंदी साहित्य अपनाया है।


भाषाओं के मेल से ,

अनेक शब्दों के खेल से।

खुद को मैंने समझाया है,

हिंदी साहित्य ही अपनाया है।

✍️ साक्षी कुमारी 

पिता:- ये राकेश झा 

 ( गोआरी सहरसा बिहार





1/1/26

दो पैसे के बल पर समझे खुद को भगवान :-साक्षी कुमारी

 


शीर्षक:- सच 

सोना चांदी मूल्यवान है,

मगर समय बलवान।

चाहे कितना भी धनवान हो,,

मगर मोक्ष मिले शमशान।।


अहंकार जब रावण जैसा,

पूजनीय क्यों राम।

कहते हो तुम बालक जिसको,,

असल वही शैतान।।


जिसको मानो हित जगत में,

वही बने हैवान।

कम से पहले फल ये चाहे,,

और करें विश्राम।।


इस धरा पर जन्मे,

है सभी मेहमान।

दो पैसे के बल पर,,

समझे खुद को भगवान।।

                 साक्षी कुमारी

( गोआरी सहरसा, बिहार)


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                 धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम 

अरावली का हुंकार:अब चुप्पी तोड़नी होगी- मनवीर सिंह"ठेठ पहाड़ी"

अरावली का हुंकार:अब चुप्पी तोड़नी होगी- मनवीर सिंह"ठेठ पहाड़ी"

  


    शीर्षक:- कविता "अरावली का हुंकार"  

मैं पत्थरों की ढेर नहीं, सदियों का जलता प्रतिशोध हूँ,
मैं शांत खड़ी थी युगों से, पर अब मैं काल का क्रोध हूँ।
हिमालय से प्राचीन मेरा, हर कण एक इतिहास है,
तुम जिसे खनन कहते हो, वो मेरी सांसों का विनाश है!

ठहरो ओ सत्ता के भूखों! मेरी धीरज को मत आजमाओ,
अपनी मशीनी नखों को, मेरी छाती से दूर हटाओ।
मैंने राणा को शरण दी, मैंने लोहा गलाया है,
मैंने ही तो मरुस्थल को, दिल्ली जाने से डराया है।

पर आज मुनाफाखोरों की, गिद्ध-दृष्टि मुझ पर टिकी है,
क्या न्याय की वो परिभाषा, चंद सिक्कों में बिकी है?
जैव-विविधता का कफन ओढ़, तुम महल खड़े जो करते हो,
याद रखना! तुम अपनी ही, कब्र की मिट्टी भरते हो।

कैसा यह न्याय का तमाशा? कैसी यह गजब की फाइल है?
जहाँ प्रकृति की बलि चढ़ाना ही, विकास का स्टाइल है!
मेरे बाघों की सिसकियाँ, क्या तुम्हारे कानों तक नहीं जातीं?
या तुम्हारी चेतना अब, कागजी नोटों से ही है नाती?

सुन लो! अगर मैं टूटी तो, मानसून का रुख मुड़ जाएगा,
तुम्हारे इन कंक्रीट के शहरों से, हर पत्ता झड़ जाएगा।
थार की खूनी आंधियां, जब द्वारों पर चिल्लाएंगी,
तब तुम्हारी ये कागजी फाइलें, तुम्हें बचा न पाएंगी।

आओ! अब सोशल मीडिया को, रणभूमि बनाना है,
सत्ता की इस बहरी नींद को, चीख-चीख कर जगाना है।
अरावली का अपमान अब, भारत का अपमान होगा,
हर हाथ में एक झंडा होगा, हर कंठ में ये गान होगा।

मैं अरावली हूँ! मैं ढाल हूँ! मैं ही तुम्हारी जड़ हूँ,
अगर तुमने मुझे उजाड़ा, तो मैं ही तुम्हारी प्रलय-घड़ी हूँ!
अब मुहीम चलेगी! अब शोर होगा!
अरावली को बचाने, अब चारों ओर जोर होगा।

 रचनाकार - 
मनवीर सिंह (ठेठ पहाड़ी)
                        ----------------------------------------

जिस पहाड़ ने सदियों से हमें थार के मरुस्थल से बचाया, जिस अरावली ने महाराणा प्रताप जैसे वीरों को अपनी गोद में शरण दी, आज उसी के वजूद पर मशीनों के नाखून गड़े हैं। विकास के झूठे नक्शों और चंद लोगों के लाभ के लिए हमारी ऐतिहासिक विरासत को मरुस्थल बनाया जा रहा है।

मैंने अरावली के इसी दर्द और आक्रोश को अपनी एक कविता के माध्यम से व्यक्त किया है। आइये, इस मुहीम का हिस्सा बनें!

कविता का अंश:

"मैं पत्थरों की ढेर नहीं, सदियों का जलता प्रतिशोध हूँ,

मैं शांत खड़ी थी युगों से, पर अब मैं काल का क्रोध हूँ!

ठहरो ओ सत्ता के भूखों! मेरी धीरज को मत आजमाओ,

अपनी मशीनी नखों को, मेरी छाती से दूर हटाओ।"

इस संदेश को और इस कविता को इतना फैलाएं कि सत्ता की बहरी नींद और फाइलों में दबे न्याय तक अरावली की चीख पहुँच सके।

 आइये मिलकर मांग करें:

 अरावली में अवैध खनन पर पूर्ण रोक हो।

 प्राकृतिक संसाधनों की ऐतिहासिक रक्षा सुनिश्चित हो।

 आने वाली पीढ़ियों के लिए 'सांसों का सुरक्षा कवच' बना रहे।

इस मुहीम से जुड़ने के लिए इस संदेश को अपने स्टेट्स और अन्य ग्रुप्स में साझा करें।

स्वरचित कविता एवं मुहीम:

मनवीर सिंह (ठेठ पहाड़ी)

नाम– मनवीर सिंह (ठेठ पहाड़ी)

एम. ए अर्थशास्त्र 

हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल (उत्तराखंड)

पता – ग्राम व पोस्ट ऑफिस, सरनौल 

तहसील बड़कोट जिला उत्तरकाशी 

(उत्तराखंड)


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पानी जैसा बना लू मैं (कविता) - सुनीता बिश्नोई


शीर्षक -पानी जैसा


पानी जैसा बना लू मैं,

अपना जीवन,

किसी प्यासे जीव की प्यास,

को शांत कर पाऊ में,

देवी -देव के चरणों को धो पाऊं,मैं,

पौधों की करू सुरक्षा मै,

उनमें,नया जीवन भर दूं मैं,

नदी- समुद्र में बहकर में,

पंछी की प्यास बुझाऊ मैं,

बनाकर पानी के जैसा उतर पाऊं ,

 मन के भीतर में,

स्वच्छ निर्मल पानी सा,

अमल हृदय सा बन पाऊं में,

पानी जैसे सबकी चाहत में,

सबका मान बन पाऊं में,

पानी जैसे सौभाग्य को बना पाऊं मैं ।।

✍️ सुनीता बिश्नोई (राजस्थान)

स्वरचित एवं मौलिक और अप्रकाशित है।

धन्यवाद।

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12/13/25

प्रेम विवाह की रीत है:-अवनीश कुमार राय

प्रेम विवाह 

प्रेम विवाह की रीत है ऐसी कोई बच ना पाए रे,

विवाह जीवन का ऐसा बंधन कभी छूट न पाए रे,

सात वचन है सात जन्म के साथ छूट न पाए रे,

मेरी तू है तेरा मैं हूं नजरे लग न जाए रेl


तेरे बारे में जब सोचूं सोच के दिल घबराए रे,

तू कैसी है मैं कैसा हूं कैसा होगा जीवन रे,

सोच सोच के मैं घबराऊं प्रेमी अपना जीवन रे,

ऐसे ही मत सोचता जाऊं जब तक तुझको पाऊं ना,

तू ही मेरा सारा जीवन तेरे बिन रह पाऊं ना l

                (अवनीश कुमार राय)


Name Avanish Kumar Rai 

Vill Basahi Jaramjepur,

 Post Madhasiya, Dist Azamgarh

Indian Army

                     


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11/11/25

प्रदूषण भरे वातावरण में हम किस साहित्यकार या राजनेता को अपनाएँ? : सिद्धेश्वर


प्रदूषण भरे वातावरण में हम किस साहित्यकार या राजनेता को अपनाएँ? : सिद्धेश्वर 

पटना, 11 नवम्बर 2025,साहित्यकार सिद्धेश्वर का कहना है कि आज का सबसे बड़ा सवाल यही है — “हमारे देश में कौन-सी राजनीतिक पार्टी सबसे अधिक ईमानदार है?”

उनका मानना है कि जब एक व्यक्ति में भी सौ प्रतिशत इंसानियत नहीं होती, तब किसी राजनेता में सौ प्रतिशत ईमानदारी की तलाश व्यावहारिक नहीं कही जा सकती।

सिद्धेश्वर के अनुसार, प्रत्येक राजनीतिक दल स्वयं को सबसे ईमानदार बताता है, पर कोई भी यह नहीं कहता कि वह “पूरी तरह सही और पारदर्शी” है। चुनाव आते ही एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है, और जनता ठोस दिशा से वंचित रह जाती है।

उन्होंने कहा कि ऐसे प्रदूषित सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में पूर्ण ईमानदारी की अपेक्षा करना व्यर्थ है, किंतु मतदान से विमुख होना भी समाधान नहीं। इस परिस्थिति में हमें वही विकल्प चुनना चाहिए जो “कम प्रदूषित” हो। सिद्धेश्वर का संदेश स्पष्ट है — “यदि हमें चयन करना ही है, तो विवेक और आत्मचिंतन के साथ करें। जाति, धर्म और स्वार्थ से ऊपर उठकर नैतिकता के आधार पर निर्णय लें — यही सच्चा लोकतंत्र 

यूट्यूब पर प्रत्येक सोमवार रात 9:00 बजे से 10:00 बजे तक प्रसारित होने वाले साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘सिद्धेश्वर की डायरी’ के एपिसोड-41 में सिद्धेश्वर ने उपर्युक्त विचार अपनी डायरी-पाठ के दौरान व्यक्त किए।

इसके बाद पत्रिकानामा खंड के अंतर्गत, रुचि शर्मा वाजपेयी के संपादन में इंदौर से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘कलम हस्ताक्षर’ (देवानंद विशेषांक एवं वार्षिक अंक) पर समीक्षात्मक टिप्पणी प्रस्तुत की गई। सिद्धेश्वर ने कहा कि “लोकप्रिय पत्रिका ‘धर्मयुग’ की परंपरा में आज प्रकाशित ‘कलम हस्ताक्षर’ का हर अंक अपने आप में अभूतपूर्व है। देवानंद विशेषांक अत्यंत संग्रहणीय बन पड़ा है।”

कार्यक्रम में सिद्धेश्वर द्वारा प्रस्तुत पंक्तियाँ—“प्यार के सागर का अंदाज़ा है क्या,/कोई आँखों की गहराई में डूब जाता है क्या?/तेरी खामोशी देख रुकने लगती हैं धड़कनें,/ तुम्हारे दिल में भी कुछ-कुछ होता है क्या?”— दर्शकों को विशेष रूप से भावविभोर कर गईं।

एपिसोड में दीक्षित दनकौरी, राहत इंदौरी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, और ग़ुलज़ार की शायरी भी प्रस्तुत की गई।

भेंटवार्ता के तहत, ‘छपते-छपते’ अख़बार के संपादक विशंभर नेवर ने कहा कि “यदि साहित्यकार में राजनीति के प्रति रुझान है, तो उसे इसमें सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। साहित्य राजनीति से अलग होकर नहीं चल सकता।”

खुला मंच खंड में युवा कवयित्री राज प्रिया रानी ने अपनी कविता का पाठ किया। उन्होंने कहा कि यह एपिसोड नए और पुराने साहित्यकारों के लिए अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि “इस तरह के कार्यक्रम यूट्यूब पर साहित्य को नई दिशा देते हैं, और समयाभाव में भी बाद में देखे जा सकते हैं।”

लेखकों और पाठकों दोनों की सक्रिय भागीदारी के कारण यह एपिसोड देशभर में लोकप्रियता प्राप्त कर रहा हैl यह कार्यक्रम साहित्यिक संस्कृति का सशक्त मंच बन गया है।

प्रस्तुति : बीना गुप्ता

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11/6/25

शरद नारायण खरे : गीत-परंपरा के सशक्त संवाहक!: सिद्धेश्वर

शरद नारायण खरे : गीत-परंपरा के सशक्त संवाहक!: सिद्धेश्वर


भारतीय काव्य-संस्कृति की एक गौरवशाली धारा रही है गीत-परंपरा। किंतु आज के समय में यह परंपरा लगभग विलुप्त-सी प्रतीत होती है। आधुनिक कविता और प्रगतिशील विमर्शों की भीड़ में गीत का आत्मीय स्वर कहीं खो-सा गया है।

फिल्मों में भी अब वे मधुर, अर्थपूर्ण और भावप्रधान गीत विरले ही सुनाई देते हैं, जो कभी जन-जन के हृदय में गूंजते थे। दरअसल, गीत केवल तुकांत पंक्तियों का समूह नहीं होता, बल्कि वह भाव और विचार का ऐसा संगीत है जो सीधे हृदय के तारों को छू लेता है।किसी भी सशक्त गीत में दो तत्व अनिवार्य होते हैं — नवीन विचार और सजीव भावाभिव्यक्ति। आज ऐसे गीतकार बहुत कम हैं जो इन दोनों गुणों का संतुलन साध सकें।इन्हीं विरले रचनाकारों में एक प्रतिष्ठित नाम है — डॉ. शरद नारायण खरे।


डॉ. खरे ने अपने गीतों में युगबोध, संवेदना और जीवन-सत्य — तीनों का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया है। वे गीत के माध्यम से समय के अंतर्विरोधों और समाज के बदलते मूल्यों पर गहरी दृष्टि डालते हैं।

उनके एक गीत की पंक्तियाँ इस दृष्टि से अत्यंत मार्मिक हैं —

“दिल छोटे, पर मकां हैं बड़े, सारे भाई न्यारे,अपने तक सारे हैं सीमित, नहीं परस्पर प्यारे।”

साहित्यिक संस्था भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में गूगल मीट के माध्यम से तथा यूट्यूब पर लाइव प्रसारित “हेलो फेसबुक कवि सम्मेलन” का संचालन करते हुए कार्यक्रम के संयोजक सिद्धेश्वर ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किए।

समकालीन कविता के आकार-प्रकार पर उन्होंने अपनी डायरी से भी कुछ अंश प्रस्तुत किए।


कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष ने अपने कुछ उत्कृष्ट गीतों का पाठ किया। अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी में उन्होंने कहा —" पत्रिका हो या सोशल मीडिया, साहित्य के लिए कुछ समय देना ही श्रेष्ठ रचनाओं के सृजन का माध्यम बनता है। आज अधिकांश रचनाकार प्रकाशित होना तो चाहते हैं, किंतु पढ़ना और सुनना उन्हें पसंद नहीं। वे केवल अपनी रचनाओं की प्रस्तुति के पीछे व्यस्त रहते हैं, पर दूसरों की रचनाओं को सुनने-पढ़ने में रुचि नहीं लेते — यही आज के रचनाकार और साहित्य दोनों की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

आज इस मंच पर जुड़े सभी रचनाकार अंत तक बने रहे और अपनी श्रेष्ठ रचनाओं से सम्मेलन को सार्थक बनाया। सिद्धेश्वर के संयोजन में जुड़ना अपने आप में एक उपलब्धि है।”


देशभर के एक दर्जन से अधिक कवियों ने अपनी सशक्त रचनाओं का पाठ किया।

डॉ. शरद नारायण खरे ने अपने अंदाज में कई गीत और मुक्तक प्रस्तुत किए —

“तुम्हारी याद को हमने अभी भी है सँजो रक्खा,

दुआओं में, वफ़ाओं में अभी भी है छुपा रक्खा।”

संचालन के क्रम में सिद्धेश्वर ने अपनी आज़ाद शायरियाँ सुनाकर सभी को आकर्षित किया —

“तुमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा होना मेरी किस्मत,प्यार में नुक़सान-नफ़ा होना मेरी किस्मत।,हसरत ही रह जाएगी तुमसे रू-ब-रू होने की, ख्वाबों में मिलना कई दफ़ा — मेरी किस्मत।”

कवि नरेन्द्र कुमार ने “मतदान” पर एक प्रेरक कविता सुनाई —

“करो मतदान, करो मतदान,पहले मतदान, फिर और काम।”

वहीं निर्मला कर्ण ने छठ पूजा पर एक सुंदर कविता प्रस्तुत की —

“षष्ठी पूजा के लिए हुए सभी तैयार,छठ माता की वंदना करेंगे सपरिवार।”


नंदकुमार आदित्य ने भोजपुरी में रचना प्रस्तुत की —“सेल्फी नीके आई बाकिर लील सकेला रेत प गोह,

एही से कहेले ‘नक्कू’ छोड़ दिहीं रंगरेजिया मोह।”

अलका जैन ने सर्दियों की बारीक भावनाओं पर मुक्तक पढ़े —

“आ गया मौसम सुहाना सर्दियों का,रुठना फिर मान जाना सर्दियों का।”

डॉ. प्रीतम कुमार झा ने अपने हास्य-व्यंग्य और गीतों से वातावरण जीवंत कर दिया —

“सागर जिसे वंदन करे, पर्वत उतारे आरती,माँ भारती, माँ भारती,हर प्राणी के भाग्य को, हाथ से जो सँवारती — माँ भारती।”

वरिष्ठ कवयित्री पूजा रवि ने अपनी आज़ाद ग़ज़ल से समापन को उत्कर्ष पर पहुँचा दिया —

“ख़यालों में तुमने मुझे यूँ सताया,रातों को कितना मुझे यूँ जगाया।कहीं जिस नज़र ने किया खूब जादू,

उसी ने हमें आज कितना रुलाया।”


इनके अतिरिक्त देशभर से जुड़े अन्य कवियों में प्रमुख रहे — विज्ञान व्रत, ऋचा वर्मा, संपत्ति कुमारी, डॉ. सरिता गर्ग, राज प्रिया रानी और सोनू।

कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन राज प्रिया रानी (कार्यक्रम प्रभारी) ने किया।

📘 प्रस्तुति: बीना गुप्ता

(जनसंपर्क अधिकारी, भारतीय युवा साहित्यकार परिषद, पटना)


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10/19/25

कुछ दीये खास जलाऊंगा (हिंदी कविता):- आचार्य प्रवेश कुमार धानका

  शीर्षक- कुछ दीये खास जलाऊंगा 

:-आचार्य प्रवेश कुमार धानका

 


दीपावली का प्रकाश पर्व,मैं भी मनाऊंगा,

इस बार दिवाली पर, कुछ दीये खास जलाऊंगा,

इस बार दिवाली पर कुछ दीये खास जलाऊंगा।


जलाऊंगा एक दीया गरीब का,

जो खाता है अपने नसीब का।

सरकारें कुछ करती नहीं,

गरीबी उनकी मिटती नहीं।

दूर हो गरीबी,ऐसी उम्मीद जगाऊंगा,


इस बार दिवाली पर, कुछ दीये खास जलाऊंगा,

इस बार दिवाली पर,कुछ दीये खास जलाऊंगा।

           

जलेगा एक दीया अबला नारियों का,

कसूर कुछ भी नहीं उन बेचारियों का।

आए दिन धक्के खा रही हैं,

दहेज के लिए मारी जा रही हैं।

अबला नारी हो सबला ये ही तो मैं चाहूंगा,


इस बार दिवाली पर, कुछ दीये खास जलाऊंगा,

इस बार दिवाली पर, कुछ दीये खास जलाऊंगा।


जलेगा एक दीया उस मेहनती किसान का,

मूल्य नहीं पूरा मिलता,जिसको अपने धान का।

सर्दी-गर्मी में दुःख पाकर अन्न वह उपजाता है,

इतनी मेहनत का वो सारा कौड़ी में बिक जाता है।

किसान रहे खुशहाली में, मैं गीत खुशी के गाऊंगा,


 इस बार दिवाली पर, कुछ दीये खास जलाऊंगा,

 इस बार दिवाली पर,कुछ दीये खास जलाऊंगा।



दीया जलाऊंगा उस दलित के नाम का,

कौड़ी से भी सस्ता है, मूल्य जिसकी चाम का।

मूंछ रखे,घोड़ी पर बैठे,मटके को जब हाथ लगाए,

पीट-पीट चाम उतारी,अब बलशाली से कौन बचाए?

प्रकाशित हो दिया बोलेगा,अब भेदभाव मिटाऊंगा,


इस बार दिवाली पर, कुछ दीये खास जलाऊंगा,

इस बार दिवाली पर, कुछ कुछ दीये जलाऊंगा।



एक दीया जलेगा मजदूर का

उपेक्षित,शोषित,मजबूर का।

ये सब के सब परेशान हैं,

सरकारें देती नहीं ध्यान हैं।

इनकी पीड़ा मजबूती से,

अब मैं उठाऊंगा,


इस बार दिवाली पर, कुछ दीये खास जलाऊंगा,

इस बार दिवाली पर,कुछ दीये खास जलाऊंगा।



दीया एक सैनिक के नाम,

जो आता है देश के काम।

आज वीर सैनिक घबरा रहे हैं,

क्योंकि नेता सवाल उठा रहे हैं।

आज जाकर के सीमा पर,

 सैनिक को गले लगाऊंगा,


इस बार दिवाली पर, कुछ दीये खास जलाऊंगा,

इस बार दिवाली पर,कुछ दीये खास जलाऊंगा।



बड़ा सा दीया राष्ट्र समृद्धि के लिए,

बचाने बिगड़ती संस्कृति के लिए।

विश्व में भारत की प्रसिद्धि के लिए,

देश में धन-धान्य की वृद्धि के लिए।

इन सबके लिए दीये जलाकर, मैं प्रकाश दिखाऊंगा,


इस बार दिवाली पर, कुछ दीये खास जलाऊंगा,

 इस बार दिवाली पर,कुछ दीये खास जलाऊंगा।


          ✍️ आचार्य प्रवेश कुमार धानका

        (गाँव सुरजनपुर तहसील थानागाजी)

               जिला अलवर राजस्थान।

अध्यापक राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय 

गुर्जरों का गुवाड़ा थानागाजी,अलवर राजस्थान।

10/16/25

रंग बदलते नेताजी ( हिंदी कविता )- युवा कवि हरे कृष्ण प्रकाश



 -: शीर्षक:- 

  रंग बदलते नेताजी  

ऐ पथ के राही, तू देख ज़रा,

कैसे ज़माना बदलता है,

सच को दबाकर झूठ,

कैसे आगे बढ़ जाता है!


ऐ पथ के राही तू देख ज़रा...


रोज़ सबेरे उठते ही वो,

कैसे जनता को लुभाता है,

ट्वीट से कर वादा नेताजी,

कैसे अपना रंग बदलता है!!


ऐ पथ के राही तू देख ज़रा...


कुर्सी हेतु टिकट के खेल में,

कैसे धनकुबेर बन जाता है,

बन निडर करे जुमलेबाज़ी,

कैसे युवाओं को तड़पाता है!


ऐ पथ के राही तू देख ज़रा...

कैसे अपना रंग बदलता है!!


सृजनकार:- हरे कृष्ण प्रकाश 

          (युवा कवि पूर्णियां, बिहार)

रचना स्वरचित व मौलिक 

संपर्क :- sahityaaajkal9@gmail.com




9/17/25

हिंदी ही है जो हमें राष्ट्र हित सिखाती है-कवि प्रवीण प्यासा

 14 सितंबर हिंदी दिवस के मौके पर बेहतरीन कविता


 हिन्दी भाषा दिवस  

हिंदी ही है जो हमें हिंद की याद दिलाती है।

हिंदी ही हे जो हमें राष्ट्र गुण सिखाती हे।।

हिंदी ही है जो हमें राष्ट्र हित सिखाती है।

हिंदी ही है जो हमें हिंदोस्तान बताती है।।


हिंदी ही है जो हमें परंपरा सिखाती है।

हिंदी ही है जो हमें जयकारा बुलवाती है।।

हिंदी ही है जो हमें जीवन अलख जगाती हैं।

हिंदी ही है जो हमें दयाधर्म सिखाती है।।


हिंदी ही है जो हमें नयन बात बताती हे।

हिंदी ही है जो हमें चरण स्पर्श सिखाती हैं।।

हिंदी ही है जो हमें भाषा उत्कृष्ट बताती है।

हिंदी ही है जो हमें जन्मदिन बताती है।।


-: सृजनकार:- 

दी स्क्रीन राइटर एसोसिएशन विथ मुंबई 

कवि प्रवीण प्यासा 

वसी डूंगरपुर राजस्थान धन्यवाद बंधु 

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8/5/25

लाल किले की सुरक्षा में हुई मॉकड्रिल, नकली बम नहीं पकड़ने पर दिल्ली पुलिस के 7 जवान सस्पेंड

 लाल किले की सुरक्षा में हुई मॉकड्रिल, नकली बम नहीं पकड़ने पर दिल्ली पुलिस के 7 जवान सस्पेंड 



स्वतंत्रता दिवस ( 15 अगस्त ) को देखते हुए हर वर्ष मॉकड्रिल का आयोजन होता है जिसमें दिल्ली पुलिस को सुरक्षा के लिहाज से अलग अलग ट्रेनिंग दी जाती है । ऐसे में इस वर्ष भी यह मॉकड्रिल आयोजित हुआ जिसमें सुरक्षा के दृष्टिकोण से लापरवाही सामने आई हैं । 


जानिए क्या है पूरा मामला -


 ANI को दिल्ली पुलिस ने बताया कि स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारियों को लेकर दिल्ली पुलिस प्रत्येक दिन अभ्यास कर रही है । इसी अभ्यास में एक स्पेशल टीम सुरक्षा ड्रिल कर रही थी। इस दौरान कुछ अफसर आम आदमी बनकर सादे कपड़ों में परिसर में घुसे और साथ मे नकली बम भी लेकर गए । ताज्जुब की बात यह रही कि लाल किले की सुरक्षा में तैनात उस समय के पुलिसकर्मी बम डिटेक्ट नहीं कर सके । इस बड़ी लापरवाही के बाद दिल्ली पुलिस ने सभी सात जवानों को सस्पेंड कर दिया ।


हर साल प्रधानमंत्री लाल किले से झंडा फहराने के बाद देश को सम्बोधित करते हैं । ऐसे में पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था को संभालना बड़ी जिम्मेदारी होती है । इस साल परिसर को सुरक्षा को और भी पुख्ता करने के लिए हाई टेक कैमरे लगाए गए हैं। 


बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ा दिल्ली पुलिस ने -


इसी बीच दिल्ली पुलिस ने लाल किला परिसर में जबरन घुस रहे पांच बांग्लादेशी को पकड़ा है जो दिल्ली में मजदूरी करते है । उनके पास से कुछ बांग्लादेशी दस्तावेज भी मिले है । गिफ्तारी के बाद उनसे पूछताछ चल रही है ।