7/17/26

तेरी याद में हमने खुदको (ग़जल) :- बापुरे "किरण"

 


ग़जल :- बापुरे "किरण"

तेरी याद में हमने खुदको 

भुलाकर रख दिया 


ये नाशाद दिल तेरे नाम से 

जोडकर रख दिया 


तेरे दम से मेरा क़लाम 

लालो गुहरसे भर रख दिया 


इसे बेचैन दिल का फलसफा 

समजकर रख दिया 


प्यार भरी लाफानी आवाज 

आज भी लुभाती है 


मग़र वक्तने हमें माइल 

बनाकर रख दिया 


वफासे बढकर कोई बात नहीं 

रूसवाईयोंसे न घबरायेंगे 


ये आशिक़ाना मिज़ाज इश्क़ की 

डोर से बांधकर रंग दिया 


किस हदपे आ गयी जिंदगी 

कौन पुछेगा दिल का फ़साना? 


हालात खुद रास्ता बनालेंगे 

दिल जलाकर रख दिया 


         बापुरे "किरण "

(महाराष्ट्र)

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 धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम



मैं भी बेफिक्र हुआ करता था( कविता):- नीलम साहू



  शीर्षक :- मैं भी बेफिक्र हुआ करता था...

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...


जमीं पर सही से पैर पसार

ख्वाहिश बुनने का जमाना था

पिता की कमाई में ऐश करते थे हम

दो वक्त की रोटी तब कहाँ कमाना था.....

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...


गली मोहल्ले और औरों के घर नापते

शाम को घूम फिर घर लौट आना था

बचपन क्यूँ चला गया इतनी जल्दी

सुबह उठते ही जिम्मेदारी का बस्ता ले जाना था....

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...


कच्चे घरों में पक्के सपने पकते थे

वो भी क्या गजब फसाना था

बात और न थी कुछ उस वक़्त

बस बात-बात पर हँसना और हँसाना था.....

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...


मस्ती मजाक से भरी पूरी थी ज़िंदगानी

नादानियों से भरा बचपन और दिल बचकाना था

खिलखिलाता रहता था आशियाँ मेरा

खूबसूरत मेरे लिए मेरा काशाना था.....

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...

-नीलम साहू(निम्मू)

कुरूद,धमतरी(छत्तीसगढ़)


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7/16/26

पग पग पर हैवान मिलेंगे(ग़ज़ल)- डॉ. मेहता नगेन्द्र

 हरित-ग़ज़ल:- डॉ. मेहता नगेन्द्र

पग पग पर हैवान मिलेंगे

मुश्किल से इन्सान मिलेंगे

मन्दिर के आगे होंगे सब

मतलब के हनुमान मिलेंगे

जंगल का रकबा घटने पर

पथरीले मैदान मिलेंगे

हरियाली के घर सन्नाटा

कांटों के गुलदान मिलेंगे

वैश्विक तापन, भू पर आफ़त

तेजस में दिनमान मिलेंगे

धरती पर उच्छ्वास पवन

सागर में तूफ़ान मिलेंगे

मौसम थोड़ा साथ निभाना

बादल जी हलकान मिलेंगे

रहना सचेत सदा 'मेहता'

संगम पर शैतान मिलेंगे

✍️ डॉ. मेहता नगेन्द्र 

(पटना, बिहार)


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बगावत (कविता) :- अखिल उमराव

                       

   शीर्षक- "बगावत"- अखिल उमराव( भारतीय नौसैनिक )

निज इज्जत गिरवी रखवा करके  पक्षपात जब हो जाए।

अस्तित्व बंधे एक सीमा में व   लाज शर्म सब खो जाए ।।

टेक जमीं पर घुटने जब           दम घुटने लगे गिरे तन में।

हो चीरहरण मर्यादा का       तब शेष रहे क्या जीवन में.?

सोच संकुचन में डूबे             विस्तृत होवे  बस अहंकार।

स्वार्थ वहां हावी होकर          भावों का करता प्रतिकार।।

सत्ता शासन की नींव अगर       तानाशाही पर टिक जाए।

जनता न्याय मांगे फिर किससे जब राजा ही बिक जाए।।

साहस के सम्मुख जब-जब    दुस्साहस जमकर बरपा हो।

सब निढाल हो जाते हैं   जब अरि का बल एकतरफा हो।।

शोषण अविरत बढ़ता जाए हो   और हनन अधिकारों का।

और दमन चक्र में पिस जाए सारा साम्राज्य विचारों का।।

कुछ अपने ही जब विरोध की।       चाल सोचने लगते हैं।

लाशों का सारा मांस       गिद्ध  व बाज नोचने लगते हैं।।

 फिर मोह माया सर्वस्व त्याग      बैरागी होना पड़ता है।

जब पानी सर से ऊपर हो      तब बागी होना पड़ता है।।


जनमानस की उम्मीदों पर     जब पानी फिरने लग जाए।

व मन का संबल टूट हार कर   खुद ही गिरने लग जाए।।

धरती से लेकर अंबर तक    बस अंधकार ही व्यापित हो।

वरदान छिपा हो भय खा के मानो कि वो अभिशापित हो।।

फिर अपक्षय हो चट्टानों का         ,पर्वत में दर्रा आ जाए।

भय अपना मुंह फैला कर सारा      नींद चैन भी खा जाए।।

सूर्य उदित ना दिखे कभी           मेघों की परतें काली हों ।

नदियों की धारा उल्टी हो          सागर भी सारे खाली हों।।

जब प्रजा मरी जाए भूखी           व खाद्यान्नों में ताला हो।

सब पेश आएं अजनबियों से   जैसे कि देश निकाला हो।।

पापों की सीमा बढ़ जाए   अपराध तनिक भी हो ना क्षम्य।

जनतंत्र विवस लाचार दिखे व दमन चक्र जब हो अदम्य।।

हो विस्फोटित जब चक्षु ज्वाल   प्राणों का अपने मोह भगे।

व उत्कंठा हो जाएं प्रबल          आजादी को विद्रोह जगे।।

तब यातनाओं - विपदाओं का    अनुरागी होना पड़ता है।

जब पानी सर से ऊपर हो       तब बागी होना पड़ता है ।।


अतिवृष्टि अत्याचारों की         जनता को जब करें त्रस्त ।

व न्यायपालिका बंद रहे  , हो कार्यप्रणाली अस्त-व्यस्त।।

हो अवहेलित जब प्रेम और     कष्टों का होता ध्यान नहीं।

तब मांस काट लेते तन से    बस पूछ हिलाते स्वान नहीं।।

मिथ्या के वारों से डरकर  बुजदिल बनकर जब छुपे सत्य।

तब वहां दासता की सत्ता    आकर कर लेती आधिपत्य।।

हर उठते स्वर को दबा- दबा जिहव्या को जब जाए काटा।

जब साहस      के ही कुनबे में दिखने लग जाए सन्नाटा।।

अपनी  ही धरती  पर  जब  हों  वार  तुम्हारे  ही मन  पर।

हड़ताल सदा  ही जारी हो  या कि तुम बैठो अनशन पर।

कुछ  ही आवाज  उठाते  बाकी  घुस के  रहे मकानों में ।

बोलो   जूँ   रेंगेंगी   कैसे   , बहरी   सत्ता   के  कानों  में ।।

भौगोलिक तह हों खंड-  खंड,   काला   हो जाए इतिहास।

उन्नति रथ का जब धंसे चक्र    सर्वत्र दिखे बस सर्वनाश।।

जब हिंसा की घटनाओं पर ना किया   जाए कोई विस्मय।

संकेत यही देता है कि      आने वाली है        महाप्रलय।।

जब सुलह - सन्धि की बातों पर होने वाला ना हो विचार।

भक्षण की घात लगाए बैठे हों व्याले      जब मुंह पसार।।

आंखों पर पट्टी बांधो      अपने तन         गंगाजल डालो।

जो फन डसने आए आगे उसको अतिशीघ्र कुचल डालो।।

जब सहनशीलता हो घायल         व लगे पंख हैवानों में।

तब लांघ घरों की देहरी     लेकर चलो शस्त्र मैदानों में।।

कुंठाएं मन में हावी हो        धारण कर लेती जब कराल।

प्रतिशोधित मन से फूट पड़े    अंगारों जैसा जब उबाल।।

तो आर- पार स्पर्धा में          प्रतिभागी होना पड़ता है ।

जब पानी सर से ऊपर हो    तब बागी होना पड़ता है।।


हो लिप्त भोग में नृप सब तज   व दांव लगे हों प्यादों पर।

व डाला जाए पर्दा जब          जनता के नेक इरादों पर।।

जब कुलीन कर बल प्रयोग      निम्नों पर अत्याचार करें।

व हर उठती आवाजों का           निर्दयता से संहार करें।।

चहुंओर निरंकुशता ही  हो व        शासक हो अत्याचारी।

जब तक इस तन में प्राण रहे तब तक संघर्ष रखो जारी।।

कोई नेतृत्व उभर कर आए    जो अरियों       पर हावी हो।

सोच समझकर रखे कदम    और सारे कदम प्रभावी हो।।

उसकी उठती आवाजों का     सारी  जनता  अनुकरण करें।

जब समय मृत्यु का आ जाए सब हंस- हंस उसका वरण करें।।

आंच , सांच को आए ना       सच में ही  तपने वाला   हो।

वो खड़ा रहे निर्भीक सदा ,सच को  ही जपने वाला   हो।।

जब घोर पतन की नौबत हो तब तन- मन को तैयार रखो।

और हाथ जोड़ने     वाले अपने   हाथों में हथियार रखो।।

हर मुद्दों पर, हर कदमों     पर जब रोष जताया   जाएगा।

जब चरित्र व     हर कर्मों      पर दोष लगाया   जाएगा।।

तब कुल - कलंक मर्यादा तज कर दागी होना पड़ता है।

जब पानी सर से ऊपर हो   तब बागी होना   पड़ता है।।

     ✍️अखिलानन्द (अमौली - यूपी)

     


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जग हो भैया हो गेलो बिहनवाॅ(गाना) :- नरेंद्र कुमार दांगी




 तर्ज _जाए चंदा ले आवा खबरिया

  गाना_ जग हो भैया हो गेलो बिहनवाॅ  

शिव गुरु करेला पुकार हो

जगा हो भैया जागा हो बहना

 शिव गुरु करेला पुकार हो

पहले में दया मंगिया दूसरा में चर्चा 2

तीसरा में करिया प्रचार हो

जागा हो भैया जगा हो बहना शिव गुरु करेला पुकार हो

नीलम दीदी देहलन तीन गो सुुतरवा _2

हरेंद्र भैया कैलन प्रचार हो

जागा हो सभे शिश्या करा शिव चर्चा

शिव गुरु करेला पुकार हो

गाॅवे गाॅवे घरे-घरे चलल शिव चर्चा

ना कोई पैचाॅ उधर हो

सभी धर्म करेला शिव के पुजनवा

रुपवा हो चाहे हजार हो

कहेला 'आशीष' भैया कर शिव चर्चा

कृपा बरसेला हजार हो

        *समाप्त *

 ✍️नरेंद्र कुमार दांगी 

        (नवादा, बिहार)


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7/15/26

मेरा तेरा में क्या है (कविता) :- संजय जैन "बीना"



 शीर्षक : मेरा तेरा में क्या है

विधा : कविता

मेरा तेरा कर-कर के

निकल गई ता उम्र। 

कुछ भी तो मिला नही

देखो अब तक हमें ।। 


काल कल्पनाओं का देखों

कैसा दौर अब आ गया। 

जीत हार का अंतर भी

एक सेकेंड ने गमा दिया।। 


गति नियंत्रण करना भी 

हम को आना चाहिए। 

कब तेज और कब धीमा 

हमें जीवन में दौड़ना है।। 


एकल विचार धाराओं का

अब अंत सा हो रहा है। 

इसीलिए फिर से हमें

मिल जुलकर रहना है।। 


सीमित रहने से हमनें

कितना कुछ गमा दिया। 

न बच्चों को दादा-दादी का

स्नेह प्यार भर-पूर मिला।। 


छोड़ों पैसे की हवस को

जिससे रिश्तें बिगड़तें है। 

बड़े बुजुर्गों के आशीर्वाद से

क्या सच में पैसा बड़ा है।। 


जीवन की सबसे बड़ी 

एक बात समझ लो। 

भाई-बहिन माँ-बाप से

बढ़कर जग में कोई नही।। 


जय जिनेंद्र

संजय जैन "बीना" मुंबई


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पढ़ने का आधार है पुस्तक( कविता) :- शिवा कुमार



शीर्षक :- पढ़ने का आधार है पुस्तक

पढ़ने का आधार है पुस्तक 

 हम सबका उद्‌धार है पुस्तक


पुस्तक से जो पढ जाओगे 

अच्छे पद को पा जाओगे

 अगर नहीं पढ पाओगे तो 

 इस जग में क्या कर पाओगे

 होती नहीं बेकार है पुस्तक

 पढ़ने का आधार है पुस्तक


पुस्तक से जो बने महान

 उनका करते हैं गुणगान 

उन सब ज्ञानी विद्वानों को 

 जग के लोग करें प्रणाम 

सपना करे साकार है पुस्तक

 पढ़ने का आधार है पुस्तक


कागज पुस्तक और कलम को 

अच्छे से प्रयोग तुम करना 

मेरी बात ध्यान तुम रखना

 यही करे साकार है सपना 

मानो तो चमत्कार है, पुस्तक 

पढ़ने का आधार है पुस्तक

✍️ शिवा कुमार

(उत्तरप्रदेश)


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मूल्यवान अनंत प्रेम (कविता):- साक्षी झा


   शीर्षक:- मूल्यवान अनंत प्रेम 

मेरे नयन बड़े व्याकुल हैं 

प्रीतम दरस को तरसत है ।

किस विधि मैं  देखूं  तुमको,,

 मेरे नयन  बरसत है।।


राह निहारु ,

आश लगाऊं।

तेरी प्रीत धुन मैं ,,

हर पल दोहराऊं।।


कल्पना कर मैं,

तेरी प्यारी छवि निहारू।

प्रेम वाटिका को मैं सजाऊ,,

तेरे प्रेम की मैं आश लगाऊं।।


 ✍️   साक्षी झा

(सहरसा, बिहार)


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अभी राह तो शुरू हुई है(कविता):- सिन्हा अंकित कृष्णा



  शीर्षक :- शिक्षा  

अभी राह तो शुरू हुई है, 

मंजिल काफि दूर है।

कलम उठाओ लक्ष्य साधो, 

तुमको आगे बढ़ना है।।

सुरज जैसे धुप बिन, 

चांदनी बिन चाँद आधुरें हैं।

वैसे हम तुम इस जीवन में, 

बिन शिक्षा आधुरें हैं ।।


आ कदम से कदम मिला कर चल, 

जीवन में ऐसा कुछ काम करो।

हो जग में रौशन नाम तेरा, 

कुछ तो ऐसा काम करो ।।

सफलता रूपी फल, 

जिस वृक्ष पर लगते हैं ।

परिश्रम रूपी वृक्ष पर, 

मिठे फल उगते हैं।।


कार्य- सिध्दि का ध्रुव उपासक, 

ही सफलता के शिखर पे चढ़ता है।

अपने इरादो को साकार करता, 

निरंतर प्रयत्न करता हैं ।।

आओ हम सब संकल्प करें, 

बिन शिक्षा नहीं रहना हैं।

हो जग में रौशन नाम मेरा, 

कुछ तो ऐसा करना हैं।।

         

        ✍️ सिन्हा अंकित कृष्णा

  ( नवादा, बिहार)

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7/10/26

महंगाई पर मौन क्यों? (कविता) - हरे कृष्ण प्रकाश

 देश में बढ़ती महंगाई पर आज वही जनता मौन है, जो कुछ साल पहले सड़कों पर आवाज़ बुलंद करती थी! आखिर अब वह क्यों चुप्पी साधे है? कब चुप्पी तोड़ेगी? इसी को ध्यान में रखते हुए पूर्णिया के युवा कवि हरे कृष्ण प्रकाश ने इस बेहतरीन कविता का सृजन किया है। आइए, पढ़ते हैं और आत्मसात करते हैं। यह कविता देश के कई नामचीन समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई है, जिसकी प्रति नीचे दी गई है।

   शीर्षक:- महंगाई पर मौन क्यों?   

मंदिर-मस्जिदों की खातिर,

जो खुद खूब शोर मचाती है,

नेताओं की रैली में जुटकर,

नारा खूब लगाती है।

अच्छे दिन का सपना देखकर,

अपना वोट लुटाती है,

फिर बढ़ती महंगाई पर,

जनता क्यों मौन रह जाती है?


सौ पार हुआ पेट्रोल जहाँ,

डीजल की आग झुलसाती है,

जो था कभी सस्ता सिलेंडर,

अब उसकी कीमत रुलाती है।

महंगे राशन की कड़वी मार से,

थाली भी खाली रह जाती है!

फिर बढ़ती महंगाई पर,

जनता क्यों मौन रह जाती है?


झूठे वादों के बहकावे में,

जो अपनी ही किस्मत खोती है,

थाली खाली होने पर भी,

जो जय-जयकार में सोती है।

पूछ रहे 'हरे कृष्ण' अब,

यह चेतना कब जागेगी?

फिर बढ़ती महंगाई पर,

जनता अपनी चुप्पी तोड़ेगी।


 ©®रचनाकार:- हरे कृष्ण प्रकाश 

          (युवा कवि, पूर्णियां,बिहार)

संपर्क:-  sahityaaajkal9@gmail.com

यह कविता देशभर के कई अखबारों में प्रकाशित हुई है जिसकी प्रतियां यहां है!


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                धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम



6/23/26

त्याग जहाँ मुस्काता है:- लालजी उपाध्याय


त्याग जहाँ मुस्काता है:-  लालजी उपाध्याय 

जब बाह्य शोर थम जाता है

और जग सो जाता है,

तब मन का गुप्त समंदर

धीरे-धीरे गाता है।


वह पूछे — “कौन हो तुम?”

नाम नहीं, पहचान नहीं,

तन मिट्टी, पद क्षणभंगुर,

सत्य कोई अवसान नहीं।


तुम वह नहीं जो दिखते हो,

तुम वह जो अनुभव होते हो,

दर्पण टूट भी जाए यदि,

तुम फिर भी अखंड ही होते हो।


भीतर बैठा साक्षी तुम हो,

शांत, अजर, अविनाशी,

उससे जो संबंध जुड़ जाए

कट जाए हर निराशा-फांसी 


स्वप्न सुनहरे टूटेंगे,

यह जीवन का क्रम है,

हर मिलन के पीछे छिपा

एक अनिवार्य विराम है।


मोह के धागे जितने सूक्ष्म,

उतने ही दृढ़ बंधन हैं,

जो उनसे मुक्त हो गया

वही सच में जीवन है।


त्याग जहाँ मुस्काता है,

वहीं शांति का सागर है,

जो “मेरा” से ऊपर उठे

वही अमर पथिक निर्भय है। 

रचनाकार:-

लालजी उपाध्याय 


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                धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम


मूल्यवान अनंत प्रेम (कविता) :- साक्षी झा

 शीर्षक:- मूल्यवान अनंत प्रेम

मेरे नयन बड़े व्याकुल हैं 

प्रीतम दरस को तरसत है ।

किस विधि मैं देखूं तुमको,,

 मेरे नयन बरसत है।।


राह निहारु ,

आश लगाऊं।

तेरी प्रीत धुन मैं ,,

हर पल दोहराऊं।।


कल्पना कर मैं,

तेरी प्यारी छवि निहारू।

प्रेम वाटिका को मैं सजाऊ,,

तेरे प्रेम की मैं आश लगाऊं।।


    साक्षी झा


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                धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम



 


6/8/26

आज़ाद ग़ज़ल के जनक और प्रखर हस्ताक्षर हैं सिद्धेश्वर : अपूर्व कुमार

पटना, 08 जून 2026। भारतीय काव्य-संस्कृति की परंपरा में समय-समय पर परिवर्तन और नए प्रयोग होते रहे हैं। पारंपरिक छंदों की सीमाओं को तोड़ते हुए जब महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने छंद का गहन ज्ञान होने के बावजूद पहली बार मुक्तछंद कविता लिखी, तब समकालीन रचनाकारों और संपादकों ने उसका घोर विरोध किया था। उस समय निराला ने कहा था कि वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण कविता को छंद से कुछ आज़ादी चाहिए। यही आज़ादी आगे चलकर उनकी कविता की विशिष्ट पहचान बनी और उन्हें साहित्य के इतिहास-पुरुषों में प्रतिष्ठित कर गई।

साहित्यिक संस्था भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में गूगल मीट के माध्यम से आयोजित तथा यूट्यूब पर लाइव प्रसारित “हेलो फेसबुक कवि सम्मेलन” की अध्यक्षता करते हुए युवा कवि अपूर्व कुमार ने उक्त विचार व्यक्त किए। उन्होंने आज़ाद ग़ज़ल की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वर्तमान समय में भी साहित्य में इस प्रकार के नए प्रयोग हो रहे हैं। पारंपरिक ग़ज़ल की परंपरा से आगे बढ़ते हुए महाकवि गोपालदास ‘नीरज’ ने ‘गीतिका’ तथा विख्यात शायर दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को नई पहचान दी। प्रारंभिक विरोध के बावजूद आज इन प्रयोगों को व्यापक स्वीकृति प्राप्त है। हिंदी ग़ज़ल आज सर्वाधिक लोकप्रिय काव्य-विधाओं में से एक बन चुकी है।


उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की नब्ज़ को पहचानते हुए वरिष्ठ कवि सिद्धेश्वर उर्दू और हिंदी ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ‘आज़ाद ग़ज़ल’ का सृजन कर रहे हैं। तमाम विरोध के बावजूद देशभर के अनेक कवियों ने आज़ाद ग़ज़ल कहना प्रारंभ कर दिया है। हृदय से निकली यह ग़ज़ल मात्राओं की स्वतंत्रता अर्थात बहर की आज़ादी के साथ रदिफ काफिया के साथ अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है। पत्र-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया और काव्य-मंचों पर इसकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ रही है।


डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना ने उचित ही कहा है कि जिस प्रकार लघुकथा की स्वतंत्र पहचान स्थापित करने के लिए आज डॉ. सतीशराज पुष्करणा को स्मरण किया जाता है, उसी प्रकार आने वाले समय में आज़ाद ग़ज़ल के लिए सिद्धेश्वर को याद किया जाएगा। सिद्धेश्वर आज़ाद ग़ज़ल के जनक और उसके प्रखर हस्ताक्षर हैं।


समकालीन कविता के स्वरूप और आज़ाद ग़ज़ल पर विचार रखते हुए कार्यक्रम का संचालन कर रहे सिद्धेश्वर ने अपनी कुछ आज़ाद ग़ज़लें भी प्रस्तुत कीं—"ज़िंदगी, तू मौत से घबराती क्यों है? /जीने के पहले तू मर जाती क्यों है?/ रात को भला कैसे आएगी भरपूर रोशनी, /सूरज के सामने तू गिड़गिड़ाती क्यों है?"

ऑनलाइन आयोजित इस कवि सम्मेलन में शामिल अधिकांश कवियों ने आज़ाद ग़ज़लें प्रस्तुत कीं। इनमें प्रमुख थे— संतोष मालवीय, अपूर्व कुमार, डॉ. अनुज प्रभात, सपना चंद्रा, सिद्धेश्वर, रशीद गौरी, ऋचा वर्मा, सुरेंद्र अरोड़ा, राज प्रिया रानी, नंदकुमार मिश्र एवं निर्मला कर्ण ।

इसके अतिरिक्त ऑनलाइन उपस्थित रचनाकारों में दुर्गेश मोहन, लखन महतो, प्रणय सिंह, एकलव्य केसरी, सुनील कुमार पाठक, श्याम सुंदर अग्रवाल, सेवा सदन प्रसाद, कुलवंत मिश्रा, प्रो. शरद नारायण खरे, सुनील कुमार उपाध्याय, खुशबू मिश्रा तथा कल्पना सिंह आदि की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अनुज प्रभात ने किया।


प्रस्तुति : बीना गुप्ता

(जनसंपर्क अधिकारी, भारतीय युवा साहित्यकार परिषद, पटना)


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                 धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम

 


5/27/26

शिवत्व (कविता) - लालजी उपाध्याय

शिवत्व (कविता) - लालजी उपाध्याय


मैंने शिव को मंदिरों में खोजा।

घंटियों की ध्वनि में,

धूप की सुगंध में,

मंत्रों की गूँज में।

क्षण भर शांति मिली,

पर भीतर का तूफ़ान शांत नहीं हुआ।

तब प्रश्न उठा —

क्या शिव बाहर हैं,

या भीतर छिपे हैं?

और उसी प्रश्न से

यात्रा भीतर मुड़ गई।


मेरे भीतर क्रोध था।

अन्याय पर,

अस्वीकृति पर,

असफलताओं पर।

वह ज्वालामुखी की तरह था—

दबा हुआ, पर प्रचंड।

मैं उसे पवित्र नहीं मानता था।

मैं उसे दोष समझता था।

पर एक दिन समझ आया —

ऊर्जा न अच्छी होती है, न बुरी।

दिशा तय करती है उसका स्वरूप।

क्रोध को दबाने से वह विष बनता है।

समझने से वह शक्ति।


शिवत्व का अर्थ है

विष को पहचानना।

ईर्ष्या,अहंकार,लोभ,तुलना —

ये सब भीतर के विष हैं।

मैंने पहले उन्हें छुपाया।

फिर उनसे भागा।

पर जब सामना किया,

तो जाना —

उन्हें बाहर फेंकना संभव नहीं।

उन्हें रूपांतरित करना होगा।

जैसे नीलकंठ ने विष पिया,

वैसे ही मुझे अपने अंधकार को स्वीकारना पड़ा।


रूपांतरण शांति से नहीं होता।

कभी भीतर तांडव करना पड़ता है।

पुरानी धारणाएँ तोड़नी पड़ती हैं।

झूठी पहचानों को गिराना पड़ता है।

जब अहंकार टूटता है,

तो दर्द होता है।

पर वही तांडव

नई चेतना को जन्म देता है।

मैंने अपने भीतर

एक-एक करके दीवारें गिराईं।

और हर गिरती दीवार के साथ

मैं हल्का होता गया।


तांडव के बाद

एक गहरी शांति आई।

जैसे तूफ़ान के बाद

निर्मल आकाश।

मैं मौन में बैठा।

विचार आते रहे,

पर मैं उनसे जुड़ा नहीं।

मैं साक्षी बन गया।

और उसी साक्षी भाव में

शिवत्व का प्रथम अनुभव हुआ।

न प्रतिक्रिया,

न आवेग।

बस सजगता।


शिव केवल संहारक नहीं।

वह करुणा का सागर हैं।

जब मैंने स्वयं को क्षमा किया,

तभी दूसरों को भी क्षमा कर पाया।

पहले मैं न्याय चाहता था।

अब समझ चाहता हूँ।

पहले मैं विजय चाहता था।

अब संतुलन चाहता हूँ।

शिवत्व संतुलन है—

ऊर्जा और शांति का।

शक्ति और करुणा का।


शिवत्व का एक आयाम है —

विरक्ति।

त्याग नहीं,

पर आसक्ति से मुक्त होना।

जब प्रशंसा मिले,

तो अहंकार न बढ़े।

जब आलोचना मिले,

तो आत्मा न गिरे।

यह सरल नहीं।

पर अभ्यास से

मन स्थिर होता है।

और स्थिर मन ही

शिव का आसन है।


मैंने ध्यान को अभ्यास बनाया।

शुरू में कठिन था।

विचार रुकते नहीं थे।

पर धीरे-धीरे

उनके बीच अंतराल दिखने लगे।

उसी अंतराल में

एक गहरा प्रकाश था।

वह प्रकाश शांत था,

पर जीवित।

वही शिवत्व की धड़कन थी।


अंततः समझ आया —

शिवत्व प्रयास का भी पार है।

जब सब नियंत्रण छोड़ दिया,

जब जीवन को स्वीकार लिया,

जब परिणामों की चिंता कम हुई —

तब एक सहजता आई।

समर्पण हार नहीं है।

वह विश्वास है।

और विश्वास में

भीतर की कठोरता पिघल जाती है।


अब मैं मंदिर जाता हूँ,

पर जानता हूँ —

वह प्रतीक है।

शिव कोई दूर बैठा देव नहीं।

वह चेतना का शिखर है।

जब मैं सजग हूँ —

वह शिव है।

जब मैं संतुलित हूँ —

वह शिव है।

जब मैं करुणामय हूँ —

वह शिव है।

मैं पूर्ण नहीं,

पर यात्रा पर हूँ।

और हर दिन

जब मैं अपने अंधकार को प्रकाश में बदलता हूं 

तब थोड़ा शिव 

मेरे भीतर जन्म लेता है 


रचनाकार:- लालजी उपाध्याय

स्नातक (बी.ए.) अंतिम वर्ष के छात्र एवं 

निजी विद्यालय के शिक्षक

लौवा टेपरा, बेलसर, गोंडा, उत्तर प्रदेश

पिता का नाम : परमतमा दीन उपाध्याय


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5/10/26

मां से बढ़कर कोई न दूजा ( मातृ दिवस पर कविता) - हरे कृष्ण प्रकाश

मातृ दिवस पर मां के लिए हिंदी में सबसे बेहतरीन कविता .... शीर्षक मां से बढ़कर कोई न दूजा - युवा कवि हरे कृष्ण प्रकाश 

 मां से बढ़कर कोई न दूजा,

उसने ही मुझको है सींचा।।

करुणामयी वो ममतामयी है,

मेरे लिए मां सर्वोपरि है।।


खुद भूखी रह मुझको खिलाया,

हाथ पकड़ मां चलाना सिखाया,

ज्ञान की ज्योति मुझमें जलाने,

उंगली पकड़ मां लिखना सिखाया।।


मां से बढ़कर कोई न दूजा,

उसने ही मुझको है सींचा।।


बाधा जब जब पास थी आती,

लिपट मां मुझे सीने से लगाती,

सुख चैन सब त्याग उसने तो,

हर खुशियां है मुझपर लुटाती।।


मां से बढ़कर कोई न दूजा,

उसने ही मुझको है सींचा।।


मां की ममता और आंचल से,

यह दुनियां भी लगती है छोटी,

घूम घूम कर देखा जहां पर,

मां के चरणों में स्वर्ग है पाया।।


मां से बढ़कर कोई न दूजा,

उसने ही मुझको है सींचा।।

करुणामयी वो ममतामयी है,

मेरे लिए मां सर्वोपरी है ।।

       - हरे कृष्ण प्रकाश 

  (युवा कवि, पूर्णियां बिहार)


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4/9/26

कुछ सब्र ( हिंदी कविता) :- साक्षी कुमारी

 


शीर्षक:- कुछ सब्र  

कुछ राज रखो ,

कुछ खास रखो।

अगर हो सके ,,

कुछ अपने पास रखो।।

जीवन के उसे मोड पर ,

जहां कोई भी ना साथ हो।

उम्मीद रखो तुम ,,

तुम मजबूत रहो।।

अपने हर सवाल का,

 आज ही जवाब दो ।

गैरों के विश्वास पर ,,

ना तुम कभी विश्वास रखो।।

मान नहीं, सम्मान नहीं ,

हो जहां कमजोर तुम ही।

उम्मीद रखो तुम ,,

उम्मीद रखो।।

कर्म जहां है ,

फल वहां है ।

आज नहीं तो कल ही सही,,

लेकिन अभी तो बस सब्र सही।।


साक्षी कुमारी ✍️

(सहरसा)

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4/7/26

समकालीन कविता का एक नया तेवर निशा भास्कर की रचनाओं में दिखाई देता है” : सिद्धेश्वर


“समकालीन कविता का एक नया तेवर निशा भास्कर की रचनाओं में दिखाई देता है” : सिद्धेश्वर



📍 पटना, 07 अप्रैल 2026

महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा प्रवर्तित मुक्तछंद का मूल उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करना था, न कि काव्यात्मकता का लोप करना। वर्तमान समय में जब नई पीढ़ी के रचनाकार पुनः छंद और लय की ओर उन्मुख होते दिखाई दे रहे हैं, तो यह हिंदी कविता के उज्ज्वल भविष्य का सकारात्मक संकेत है।

इसी सकारात्मक प्रवृत्ति का सशक्त उदाहरण कवयित्री निशा भास्कर की कविताएँ हैं। अब तक कहानी और लघुकथा के क्षेत्र में अपनी सशक्त पहचान स्थापित कर चुकी यह रचनाकार कविता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय संभावनाओं के साथ उपस्थित हैं। उनके गीतों और आज़ाद ग़ज़लों में सहजता, सरसता और भाव-सघनता का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है, जो उन्हें समकालीन कवयित्रियों में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

उनकी कविताओं की एक प्रमुख विशेषता श्रृंगार का सहज और सौम्य चित्रण है। उदाहरणस्वरूप—

“धरते हो प्रिये पाँव जहाँ तुम,

खिल जाता है दिग-दिगंत।”

इसी क्रम में भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में यूट्यूब चैनल पर गूगल मीट के माध्यम से एक भव्य कवि गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए संस्था के अध्यक्ष एवं गोष्ठी संयोजक सिद्धेश्वर ने अपने उद्बोधन में उपर्युक्त विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध कवयित्री एवं लेखिका निशा भास्कर ने प्रस्तुत कविताओं की सराहना करते हुए कहा कि समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जहाँ एक ओर मुक्तछंद का व्यापक विस्तार हो रहा है, वहीं दूसरी ओर गीत, नवगीत और ग़ज़ल जैसी लयात्मक विधाओं की पुनर्वापसी अत्यंत महत्वपूर्ण और आश्वस्तकारी है।

इस अवसर पर जिन रचनाकारों की कविताएँ विशेष रूप से सराही गईं, उनमें प्रमुख हैं—

निलेश अय्याची, निशा भास्कर, अनीता मिश्रा ‘सिद्धि’, सिद्धेश्वर, गोविंद कुमार मिश्र, सुषमा मल्होत्रा (अमेरिका), नंदकुमार मिश्र, डॉ. अनुज प्रभात, साक्षी लोधी, पुष्प रंजन, अनीता पांडया, रशीद गौरी एवं इंदु उपाध्याय।

कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम प्रभारी अनीता मिश्रा ‘सिद्धि’ ने सभी प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

📘 प्रस्तुति : बीना गुप्ता

4/5/26

गंगा समग्र, भागलपुर इकाई का हुआ विस्तार नए पदाधिकारियों की हुई घोषणा

गंगा समग्र, भागलपुर इकाई का हुआ विस्तार नए पदाधिकारियों की हुई घोषणा


गंगा केवल नदी नहीं यह हमारी मां है: रामाशंकर सिन्हा

मां गंगा की आरती से प्रकाशित होगा जीवन : शंभूनाथ पाण्डेय


गंगा केवल एक नदी नहीं है यह हमारी मां है और मां की सेवा किसी लाभ के लिए नहीं किया जाता है। जिस प्रकार हमारी मां हम सबों को जन्म देने का बाद लालन पालन करती है ठीक उसी प्रकार से मां गंगा भारत के करोड़ो लोगों के आजीविका का साधन है जिससे उनका भरण पोषण होता है । उक्त बातें गंगा समग्र के राष्ट्रीय मंत्री रमाशंकर सिन्हा ने बरारी स्थित एम एस एम जी फाउंडेशन में आयोजित गंगा समग्र के एक दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग में कही ।

 गंगा संरक्षण और स्वच्छता को लेकर कार्यरत संगठन गंगा समग्र, भागलपुर इकाई का रविवार को विस्तार किया गया। इस अवसर पर विभिन्न घाटों और खंडों के लिए नए पदाधिकारियों की घोषणा की गई, जिससे संगठन को और अधिक सशक्त बनाया जा सके।

नए पदाधिकारियों में बरारी

पुल घाट के घाट प्रमुख योगेन्द्र महलदार, सह प्रमुख रवींद्र कुमार, बूढ़ानाथ घाट प्रमुख प्रहलाद चौधरी,शिक्षण संस्थान प्रमुख डॉ. ब्रजेश कुमार, सहप्रमुख संतोष कुमार ,

गंगा वाहिनी आयाम सह प्रमुख धर्मेंद्र कुमार,प्रचार आयाम सह प्रमुख राजहंस कुमार, गंगा सहायक नदी आयाम प्रमुख मारुति नंदन ,सह प्रमुख नवीन कुमार,गंगा सेविका सबौर खंड प्रमुख चंदा देवी,गंगा आरती सह प्रमुख उर्मिला देवी ,घाट आयाम प्रमुख ललिता देवी,चंपानगर घाट प्रमुख दिनेश यादव , सन्हौला खंड प्रमुख प्रिया कुमारी, बाबूपुर घाट प्रमुख आशा देवी को बनाया गया। इस अवसर पर दक्षिण बिहार प्रांत के पांच जिलों भागलपुर, बांका, मुंगेर लखीसराय एवं जमुई से संगठन के कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण हुआ ।


कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय आरती आयाम के प्रमुख शंभूनाथ पाण्डेय ने कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और जीवन का आधार है। इसके संरक्षण के लिए समाज के हर वर्ग की भागीदारी आवश्यक है। वहीं राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य स्वेता सिंह ने कहा कि गंगा समग्र के इस विस्तार से भागलपुर जिले में गंगा स्वच्छता, जागरूकता और संरक्षण कार्यों को नई गति मिलेगी। सभी नव-नियुक्त पदाधिकारियों ने अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करने और गंगा को स्वच्छ एवं अविरल बनाने का संकल्प लिया। जिला संयोजक देवेंद्र कुमार मंडल ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि गंगा का जल अमृत के समान है । यह पापनाशिनी तो है ही कई रोगों का भी निवारण करती है ।इनकी सेवा से गंगा का कल्याण हो या न हो हमलोगों का कल्याण अवश्य हो जाएगा।आगामी महीनों में जिले के विभिन्न विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में गंगा स्वच्छता से संबंधित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। मौके पर प्रांत कार्यकारणी की सदस्य कांति पाठक,पूर्व जिला संयोजक अंजली घोष ,जिला सह संयोजक कुमार गौरव,रेखा साह, बंदना तिवारी सुनीता सिंह , पूनम भगत ,संतोष झा आदि उपस्थित थे

3/30/26

हम लोगों का शान है हिन्दुस्तान (कविता):- शिवा

 हम लोगों का शान है हिन्दुस्तान :- शिवा 



हम लोगों की शान है अपना हिंदुस्तान 

अपने वतन पे हम सब कर देंगे कुर्बान।


हिन्दुस्तान के वीरों ने अंग्रेजों को भगाया था। 

हम लोगों को उनकी गुलामी से बचाया था। 

15 अगस्त को हमने स्वतंत्रता दिवस मनाया था। 

स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं सब लोग भी आज

हम लोगों की शान है अपना हिंदुस्तान।


हिंदुस्तान के वीरों ने हार कभी न मानी थी।

 भारत देश के लोगों से हमने सुनी कहानी थी।

 इस मिट्टी को अपनी भारत माता मानी थी। 

भारत देश के वीरों के खातिर दे देंगे हम जान।

 हम लोगों की शान है अपना हिंदुस्तान ।


हिन्दुस्तान के वीरो ने कर दिए ऐसे काम हैं। 

देश की आजादी हेतु वीरों ने दे दी जान है।

 वीरों की कुर्बानी से अच्छा मिला परिणाम है।

 उनकी इस कुर्बानी को मेरा एक सलाम,

 हम लोगों की शान है अपना हिंदुस्तान ।

 अपने वतन पे हम सब कर देंगे कुर्बान।

सृजनकार:- शिवा 

पिता :- श्री अनिल कुमार

उत्तरप्रदेश


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                 धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम 


2/12/26

इंतजार करना सीखो(कविता):- साक्षी कुमारी



शीर्षक : इंतजार

हमेशा किसी चीज के लिए,

इंतजार करना सीखो।

क्योंकि बेताबी से,,

वह हासिल नहीं हो सकता।।


हर मोड़ पर,

हर संघर्ष के लिए तैयार रहो।

हर बार खुद को,,

और इंतजार करना सिखाओ।।


इंतजार का सफर लंबा हो,

हर लम्हा इंतजार हो।

इंतजार का सफर भी,,

हमारा, तुम्हारा,सबका सफल हो।।


बेशक नादानगी इंतजार हो,

मगर नापसंदगी इंतजार न हो।

सबका एक ख्वाब हो,,

हर बार हर एक का इंतजार हो।।


   साक्षी कुमारी ✍️

पिता - श्री राकेश झा


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