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4/30/23

शीर्षक:- "न जाने कैसे हंस लेते हैं" (कविता):- शभ्यता जरियाल

शीर्षक:- "न जाने कैसे हंस लेते हैं" (कविता):- शभ्यता जरियाल 


शीर्षक:- "न जाने कैसे हंस लेते हैं"

टकटकी लगाकर देखते हैं 

दूसरों के हाथों की और

सूरज तो नित निकलता है

नहीं होती इनके जीवन में भोर

शिकायतें मां बाप से 

नहीं कभी वे करते हैं,

दूसरों की जूठन खाते हैं

वो दूसरों की उतरन पहनते हैं।


चिथड़ों से ढकी देह लेकर 

रोज़ वो भीख मांगते हैं

नंगे जख्मी पैरों से

सड़कों की धूल छानते हैं

खिलौनों से खेलना नहीं

कूड़ा बीनना उनका काम है

सभ्य कहलाने वालों के लिए

वो पशुओं के समान हैं

आकाश की चादर ओढ़ रात को 

रोज़ नए सपने बुनते हैं 

दूसरों की जूठन खाते हैं

दूसरों की उतरन पहनते हैं।


इन्हें देखना दुष्प्राप्य नहीं

हर चौराहे पर दिख जायेंगे

एक - दो नहीं इस देश में तो

हजारों लाखों ऐसे मिल जायेंगे

सबसे अपमानित होकर भी 

न जाने कैसे हंस लेते हैं

दूसरों की जूठन खाते हैं

दूसरों की उतरन पहनते हैं।

✍️ शभ्यता जरियाल

          (पंजाब )





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